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कहानी नं. 6 · इंडोनेशिया

अपनी बिजली ख़ुद बेचने वाले गाँव

इंडोनेशिया की एक संस्था ने गाँवों को नदी पर बिजलीघर बनाने में मदद की। फिर उसने एक क़ानून बदलवाने में मदद की।

10 अक्टूबर 2026 · 4 मिनट में पढ़ें

देश
इंडोनेशिया (सुबांग से सुम्बा)
कौन
त्री मुम्पुनी और IBEKA, और वे गाँव जो इन बिजलीघरों के मालिक हैं
कब
1992 से 2012

कहानी

इंडोनेशिया के बड़े हिस्से में रात का मतलब अँधेरा है। 2012 में हर तीन में से एक से ज़्यादा लोगों को ग्रिड की बिजली नहीं मिलती थी। बहुत से लोग दूर-दराज़ के गाँवों में रहते थे, किसी भी बिजली की लाइन से बहुत दूर।

त्री मुम्पुनी IBEKA नाम की एक संस्था चलाती हैं। उनके पति, इस्कंदर कुंतोअदजी नाम के इंजीनियर, ने इसे 1992 में शुरू किया था। यह संस्था छोटी जलधाराओं पर छोटे बिजलीघर बनाती है। पानी एक टरबाइन घुमाता है, और टरबाइन बिजली बनाती है।

एक बिजलीघर, जिसका मालिक गाँव है

पहले के बहुत से प्रोजेक्ट नाकाम हो चुके थे। जर्मनी की एक सहायता एजेंसी को 1,000 से ज़्यादा ऐसे छोटे पनबिजलीघर मिले जिन्हें लोगों ने छोड़ दिया था। उन्हें चालू रखने वाला कोई नहीं था।

IBEKA अलग तरीके से काम करती है। वह पहले गाँव से बात करती है। गाँव वाले बिजलीघर बनाने में हाथ बँटाते हैं और उसे चलाना सीखते हैं। गाँव की एक सहकारी समिति उसकी मालिक होती है। IBEKA मदद के लिए करीब 18 महीने वहाँ रहती है।

मुम्पुनी कहती हैं कि हर बिजलीघर को सँभालने के लिए एक सामुदायिक समूह ज़रूरी है।

सरकार को बिजली बेचना

फिर एक बड़ा विचार आया। गाँव का बिजलीघर राष्ट्रीय ग्रिड को भी बिजली दे सकता था। गाँव वाले सरकारी बिजली कंपनी, जिसे PLN कहते हैं, को बिजली बेच सकते थे। पर PLN के लिए इसे ख़रीदना ज़रूरी नहीं था।

IBEKA ने दस साल तक ज़ोर लगाया। उस कोशिश से क़ानून बदलने में मदद मिली। अब PLN को छोटे पनबिजलीघरों से बिजली ख़रीदनी ही पड़ती है।

2005 में चिंता मेकार गाँव ने करीब 1,80,000 डॉलर की लागत वाला एक बिजलीघर शुरू किया। यह 120 किलोवाट बिजली बनाता है। गाँव का एक उद्यम यह बिजली PLN को बेचता है। पैसा गाँव में ही रहता है।

सबसे पहले मैं बर्फ़ के लिए एक फ़्रिज और अपने बच्चों के लिए एक टीवी ख़रीदूँगा।दाउद कपादिंग मलाहिना, दादा, सुम्बा द्वीप, Asia Calling से, 2011
  • 1,000+छोड़े हुए बिजलीघर, जो जर्मन सहायता एजेंसी को मिले
  • 10 सालएक क़ानून बदलवाने की कोशिश में
  • 54,000लोगों को फ़ायदा, 2012 तक

सुम्बा में रोशनी

2011 में सुम्बा द्वीप के उम्बुरुंदी में एक बिजलीघर बन रहा था। वहाँ तक की सड़क ऊबड़-खाबड़ है। सबसे पास का शहर चार घंटे से भी ज़्यादा दूर है।

दाउद कपादिंग मलाहिना के पास सिर्फ़ घर का बना एक तेल का दीया था। उन्होंने कहा कि उसकी रोशनी में उनके बच्चे पढ़ नहीं पाते। बिजली से बच्चे पढ़ सकेंगे, और महिलाएँ रात में बुनाई कर सकेंगी।

हर बिजलीघर टिकता नहीं

एक गाँव में एक कंपनी ने नदी के ऊपर की ज़मीन ख़रीद ली। उसने वहाँ गोल्फ़ का मैदान बनाया। टरबाइन तक कम पानी पहुँचने लगा, और वह बंद हो गई। मुम्पुनी मानती हैं कि उनके कुछ बिजलीघर अब काम नहीं करते।

फिर भी 2012 तक IBEKA ने ग्रिड से अलग 57 बिजलीघर और ग्रिड से जुड़े चार बिजलीघर बना लिए थे। उसी साल ब्रिटेन की संस्था ऐशडेन ने इस समूह को एक पुरस्कार दिया।

कब क्या हुआ

  1. इंडोनेशिया में IBEKA की स्थापना।
  2. चिंता मेकार में बिजलीघर शुरू, जो PLN को बिजली बेचता है।
  3. सुम्बा में एक बिजलीघर बन रहा है।
  4. IBEKA को ऐशडेन पुरस्कार मिलता है।

यह कहानी ख़ास क्यों है

साफ़ ऊर्जा के बहुत से प्रोजेक्ट बनाकर छोड़ दिए जाते हैं। यह कहानी इस बारे में है कि फ़ीता कटने के बाद बिजलीघर का मालिक कौन है। यहाँ गाँव वालों को सिर्फ़ रोशनी नहीं मिली। उन्हें एक छोटा कारोबार मिला और उसे चलाने में अपनी बात कहने का हक़ मिला।

यह धीमे काम की कहानी भी है। IBEKA ने एक नियम बदलवाने के लिए दस साल ज़ोर लगाया। और यह ईमानदार है: कुछ बिजलीघर नाकाम रहे।

हमारी रायटरबाइन से ज़्यादा मायने रखता है गाँव का वह समूह जो उसे चालू रखता है। मालिकाना हक़ ही बत्तियाँ जलाए रखता है।

हम क्या सीख सकते हैं

सिर्फ़ पहले दिन की नहीं, छठे महीने की योजना बनाएँ

IBEKA करीब 18 महीने रुकी और गाँव वालों को हर बिजलीघर चलाना सिखाया।

यह आज़माएँ: किसी एक प्रोजेक्ट के लिए लिखें कि छह महीने बाद उसकी देखभाल कौन करेगा।

लोगों को असली मालिकाना हक़ दें

हर बिजलीघर गाँव की एक सहकारी समिति का है, किसी दूर बैठी एजेंसी का नहीं।

यह आज़माएँ: जिनके लिए आप काम करते हैं, उनसे इस हफ़्ते आपके लिए एक फ़ैसला करवाएँ।

सिर्फ़ समस्या नहीं, नियम ठीक करें

IBEKA ने दस साल तक पैरवी की, जब तक PLN को गाँव की बिजली ख़रीदनी नहीं पड़ी।

यह आज़माएँ: उस एक नियम का नाम लें जो आपके लक्ष्य को रोकता है, और यह भी कि उसे कौन बदल सकता है।

जो नाकाम हुआ, वह भी बताएँ

मुम्पुनी ने IPS को खुलकर बताया कि कुछ बिजलीघर बंद हो गए थे।

यह आज़माएँ: कोई एक चीज़ बताएँ जो काम नहीं आई, और उससे आपने क्या सीखा।

साथ ले जाने वाली एक बात

ऐसा बनाइए कि वे उसे सँभाल सकें।

स्रोत (अंग्रेज़ी में)

तथ्य-जाँच नोट: पैमाने को लेकर स्रोतों में मतभेद है। ऐशडेन और IPS (दोनों 2012) 61 बिजलीघर और करीब 54,000 लोग बताते हैं। Asia Calling (2011) करीब 50 टरबाइन और पाँच लाख लोग बताता है, इसलिए वह आँकड़ा नहीं लिया गया। ऐशडेन और IPS 54,000 पर सहमत हैं। ग्रिड की बिजली के बिना लोगों का हिस्सा एक-तिहाई से ज़्यादा (ऐशडेन), 35 प्रतिशत (IPS) और लगभग 40 प्रतिशत (Asia Calling) बताया गया है। ऐशडेन इस्कंदर कुंतोअदजी को 1992 में IBEKA का संस्थापक और मुम्पुनी को कार्यकारी निदेशक बताता है; कुछ दूसरी प्रोफ़ाइलें 1993 बताती हैं या उन्हें सह-संस्थापक कहती हैं, इसलिए कहानी में दोनों के नाम हैं। चिंता मेकार की मासिक आमदनी (करीब 600 यूरो, Asia Calling से) नहीं ली गई, क्योंकि ऐशडेन प्रति किलोवाट-घंटा कीमत बताता है। 2011 की खबर के समय उम्बुरुंदी का बिजलीघर बन ही रहा था। सारे आँकड़े 2011 और 2012 के हैं, और बिजलीघरों की मौजूदा हालत की जाँच नहीं की गई। मुम्पुनी पर Ashoka के पन्ने खुल नहीं सके। “हमारी राय” वाली पंक्तियाँ हमारी अपनी व्याख्या हैं। बाकी सब ऊपर दिए स्रोतों से है।

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